प्यारे दद्दा , जानते हैं पिछले एक-दो महीने से तुम और हम ज्यादा ही व्यस्त चल रहे हैं और एक तो तुम्हारी नाईट आईटी जॉब
जिससे हम लोगों को बात करने का समय ही ढंग से नहीं मिल पा रहा तुम अक्सर पूछते हो न क्लास कैसी जा रही है ,
आज क्या हुआ और हम कहते हैं कुछ नहीं बस ठीक गया.....
तुम मेरे विभाग से डॉ मुकुल श्रीवास्तव से तो मिले ही थे जब हम मेरे एडमिशन के सिलसिले में डिपार्टमेंट आये थे।
मेरी फीस नहीं जमा हो पायी थी तो सर ने कहा था कि अब कुछ नहीं हो सकता लिस्ट हमारे पास पहले से बनके आती है ,
हमारे जाते हुए उन्होंने मुझसे पूछा था कि मॉस कम्युनिकेशन ही क्यों तब हम ब्लेंक हो गए थे शायद सही से तब
पता भी नहीं था और मन में कई सरे डर भी थे और उन्होंने एक लाइन कही थी लिखना कोई किसी को सिखा नहीं सकता ,लिखना लिखने से आता है , फिर हम लौट आये थे। आखिर कुछ मशक्कत के बाद मेरा दाखिला लखनऊ विश्वविद्यालय के
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में हो ही गया।
आज एक महीना होने को है , सर ने हमे इन बीती छुट्टियों में एक असाइनमेंट दिया था जिसमे उनकी क्लास के बारे में अपने अनुभव एक चिट्ठी के रूप पे किसी को लिखना है। मेरे ज़ेहन में तुम्हारा ख्याल आया वैसे भी व्यस्तता
के कारण आज कल हम दोनों भाई बात नहीं कर पा रहे।
नहीं पूछेंगे मुझे उस वक़्त थोड़ा अजीब लगा मगर एक राय न बनाने की कोशिश की।
सर ने उस पहली क्लास में कहा था कि तीन तरह के लोग इस कक्षा में आएं हैं पहले जो कुछ करना चाहते हैं जिनकी
कुछ आकांक्षाएं हैं , दूसरे वो लोग जो तफरी मौज मस्ती के लिए आएं हैं , और तीसरे कंफ्यूज इंसान जो तय नहीं कर
पते उन्हें क्या करना है और दद्दा तुम तो जानते हो वो तीसरे टाइप के हम ही हैं , मगर अब मेरे ख्यालों में कुछ
स्पष्टता व् कुछ संशय बचा हुआ है कि क्या मेरा मॉस कम्युनिकेशन में दाखिला लेना एक सही फैसला था।
उन्होंने उस पहली क्लास में उस वाक्य को पूरा किया कि “लिखना कोई किसी को सिखा नहीं सकता है ,
लिखना लिखने से आता है और बेहतर लिखने के लिए खूब पढ़ना पड़ता है। जैसे तुमको शुरू की क्लास का एक किस्सा बताते हैं उन्होंने कहा फ़र्ज़ करो तुम्हारे पास पैसे और सक्सेस हो औरआप अपने घर में पहली मटेरियलिस्टिक वस्तु क्या लाएंगे तो किसी ने जवाब दिया कि जगुआर कार ,किसी ने डिशवाशर और एक ने बड़ा सा आलिशान घर बाकी क्लास के लोग ऐसी बातें सुनकर हसने लगे मगर खुदतो इतनी झिझक थी हम लोग कुछ कहें और हमारा भी ऐसे मखौल उड़े फिर सर ने कहा हम एक ऐसे देश की बात कर रहे जहाँ की लगभग 30 प्रतिशत आबादी को दो वक़्त की रोटी नहीं नसीब होती , जिस देश के अधिकतर लोगों के पाबुनियादी सुविधाएँ नहीं है जैसे कि रोटी कपडा और मकान , उस देश में किसी को जैगुआर कार , किसी को डिश वाशिमशीन चाहिए और फिर क्लास की वो हसी का माहौल एक गंभीरता का रूप ले लिया।
ऐसे ही मुकुल सर कोई टॉपिक पढ़ाते हैं तो उस विषय से बात शुरू होकर हस्ते हँसाते समाज , देश दुनिया के मुद्दों और
उदाहरणों को विषय से जोड़ कर समझते हैं ,जिसमे शायद ही उबा देने की गुंजाईश बचती है।
इस क्लास में हमे मीडिया की चमक दमक के इतर इस फील्ड की चुनौतियों और उसकी आज़ादी पर मंडराते खतरे से भी
अवगत कराया है और कैसे कोई आज के दौर में जब हर कोई टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के सहारे मॉस
कम्यूनिकेटर बना फिर रहा है उसके सामने , हमारी ज़िम्मेदारी एक मॉस कम्यूनिकेटर के तौर पर अपनी बात
कैसे रखनी है अब आज और बढ़ गयी है , किस तरह हम इस तेज़ी के दौर में अपनी बात ज़िम्मेदारी के साथ
एक प्रभावी तरीके और निष्पक्षता से लोगों तक पंहुचा सकते हैं।
हमारे शिक्षक मुकुल सर एक शिक्षक की तरह दिशा देने के साथ विद्यार्थी के तौर पर हम क्या नहीं समझ पा रहे हमारकम्युनिकेशन में क्या दिक्कतें हैं उसे बखूबी समझते हैं क्योंकि एक वक़्त वो भी इसी डिपार्टमेंट की इन्ही कुर्सियों परहमारी तरह बैठा करते थे।
हमारी इस क्लास में ज्यादा से ज्यादा सवाल पूछने को कहते हैं और उसका पूरी तरह से समाधान करने की कोशिश करते हैं , और तुम भी कहते हो “Its not about the answers its about the better questions” उस समय ये बात नहींसमझ आती थी अब यहाँ आने के समझ आने लगी ज्यादा जलना मत सर की बात समझ आती है भाई की नहीं , तुमको भी अपने बयां करने के अंदाज़ पे काम करने की जरुरत है ( हा हा मजाक कर रहे थे सड़ना मत) .
सर अक्सर एक लाइन बोलते हैं कि "ठण्ड और बेज्ज़ती जितनी ज्यादा महसूस करो उतनी लगती है “ सर के लफ़्ज़ों में सारा मामला अंदाज़-ए -बयाँ का होता है कि कैसे कोई ऑडियंस को कुछ लिखे या कहे की ओरआकर्षित कर सके , उन्हें अपने शब्दों में फसा ले जैसे वो मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर कहते हैं“ हैं और भी सुख़नवर बहुत अच्छे कहते हैं ग़ालिब का अंदाज़-ए -बयाँ और। "
पता है दद्दा सर की क्लास में अधिकाँश उदाहरण फिल्मो और गानो के होते हैं
हालाँकि कुछ फिल्मों और गानो के नाम हमने पीछ्ली बार ही सुना होता है , तो उससे खुद को जोड़ कर नहीं देख पाते और
तुम तो जानते ही हो मेरी उर्दू और शेर और शायरी की समझ कितनी काम है खैर इसे भी सुधरने की कोशिश करेंगे।
अभी फ़िलहाल मुझे कुछ स्पष्टता हुई है किस तरह हम अपनी भाषा , सम्प्रेषण और बाकि तमाम चीज़ों को ठीक कर सकतें हैं और हमे खूब ज्यादा
पढ़ने की जरुरत है जैसा तुम भी अक्सर कहते हो हमसे किताबें ही हमे बहुत कुछ सिखाती हैं और उनकी सीख से दुनिया को समझने का आयाम
मिलता है चलो मगल कहते हैं न देर आये पर दुरुस्त आये।
इस एक महीने के दरमियान पूरे ही विभाग का बहुत अच्छा अनुभव हुआ खासकर हमारे HOD डॉ मुकुल श्रीवास्तव की कक्षा का और लगता है
आने वाले बचे हुए हुए समय में उनसे और बाकि शिक्षकों से बोहोत कुछ सीखने को मिलेगा।
तुम्हारा छोटा भाई
शिवांग
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