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Tuesday, July 19, 2022

शिंजो आबे की हत्या के बाद सत्तारूढ़ पार्टी की जीत

शिंजो आबे की हत्या के बाद सत्तारूढ़ पार्टी की जीत 


हाल के चुनाव के कैंपेन के दौरान एक सभा में पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की गोली मार कर निर्ममता से हत्या की गयी ।  जिस घटना ने संपूर्ण दुनिया को हिला कर रख दिया था।  भारत के प्रधानमंत्री मोदी  ने शिंजोआबे की मृत्यु पर गहरा शोक प्रकट करते हुए एक दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी ।  इससे भारत और जापान के मैत्री रिश्तों की घनिष्टता जाहिर होती है।  

जापान में  इस सप्ताह संपन्न हुए उच्च सदन के चुनाव में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी व् उसके सहयोगी दल ने बहुमत प्राप्त करते हुए जीत हासिल की। प्रधानमंत्री फूमिया किशिदा अब 2025 तक जापान के प्रधानमंत्री बने रहेंगे। उच्च सदन के चुनाव परिणाम में एलडीपी पर प्रधान मंत्री फुमियो किशिदा की पकड़ मजबूत होगी। मुद्रास्फीति से लेकर परमाणु ऊर्जा और रक्षा तक मुख्य नीतिगत मुद्दों को किशिदा अपने अनुसार लागू कर सकेंगे।  जापान में भी द्विसदनीय संसदीय व्यवस्था है जिसमे एक उच्च सदन व एक निम्न सदन लोक सदन। शिंजो आबे के प्रधानमंत्री पद त्याग करने के बाद 2021 के संसदीय चुनाव में आबे का जादू कायम रहा था  और सत्तारूढ़ दाल एलडीपी व न्यू कोमितो के गठजोड़ को 480 में से 325 सीट मिली वहीँ मुख्य विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी को 57 सीट ही प्राप्त हुईं। 


इस साल 2022 में उच्च सदन के चुनाव में भी एलडीपी के लिए पूर्व प्रधानमंत्री ने जनसभाएं की मगर सरकार की नीतियों के विरोधी एक युवक ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी। इससे पूरे देश में शोक की लहर व् लोगों में गुस्से की भावना बढ़ गई। किशिदा ने इस हमले को बर्बर करार दिया।10 जुलाई को संपन्न हुए चुनाव के  परिणाम आने पर उन्होंने ऐसे समय में ख़ुशी जाहिर न करके इसे लोकतंत्र के लिए जरुरी बताया। और पार्टी के गंभीर व सर्वोच्च नेता के तौर पर नज़र आये।  



भारत-जापान के मैत्रीपूर्ण रिश्तों का नया आयाम




भारत की दृष्टि से शिंजो आबे की मृत्यु के साथ दोस्ती जो निरंतर मजबूत हो रही थी को गहरा आघात पहुंचा है।  शिंजो आबे के कार्यकाल से पहले भारत और जापान यूँ तो सहयोगी देश थे मगर कुछ समय जैसे भारत के परमाणु परिक्षण के समय जापान द्वारा तीख़ी प्रतिक्रिया दर्ज़ की गई थी। 


भारत और जापान के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना अप्रैल 1952 में हुई थी।  इस द्विपक्षीय संबंधों को 70 वर्ष पूरे हो चुके हैं।  मगर आज भारत और जापान के रिश्ते इन 70 सालों में सबसे ज्यादा मज़बूत हैं। जापान भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक , राजनितिक , सैन्य साझीदार है।  इन संबंधों में सबसे बड़ी भूमिका पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की है। 2007 में पहली बार भारत दौरे पर आये पूर्व प्रधानमंत्री ने देश की संसद को सम्बोधित कर भारत और जापान के संबंधों को नए आयाम देने की शुरुआत की।  


2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने  के बाद भारत और जापान के बीच सिविलियन न्यूक्लियर एनर्जी से लेकर समुद्री सुरक्षा , एक्ट ईस्ट पालिसी , बुलेट ट्रैन , इकनोमिक कॉरिडोर , और इंडो पैसिफिक पर साझेदारी हुई।  

डोकलाम के मुद्दे पर उन्होंने भारत का पक्ष लिया और खुलकर चीन की विस्तारवादी नीतियों की आलोचना की। 

2017 में चीन की नीतियों व इंडो पैसिफिक में उसका दबदबा काम करने की लिए आबे ने क़्वाड की नींव रखी।  जिसमे भारत , अमेरिका , जापान व ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।  यह इन देशों के बीच व्यापारिक व एक अहम सैन्य समझौता है।  


यह साझेदारी 2020 में शिंजो आबे के प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद भी जारी है।  मार्च 2022 में जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा दो दिवसीय भारत दौरे पर आये थे।  तब दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने दोनों देशों के बीच आर्थिक , सामरिक और राजनितिक संबंधों को और मज़बूत बनाने के साथ अन्य मुद्दों पर भी चर्चा की।  


जापान के प्रधानमंत्री ने अगले पांच वर्षों में भारत में 42 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। जापान के साथ भारत का कुल व्यापार २०२०-२१ में 15. 3 बिलियन डॉलर पहुंच गया। किशिदा ने निवेश के प्रमुख क्षेत्रों में विनिर्माण , जलवायु परिवर्तन , इलेक्ट्रिक व्हीकल और इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया। 


24 मई को हुई क्वाड समिट 2022 में जब जापान के प्रधानमंत्री किशिदा से रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत के रुख को लेकर सवाल किया गया उन्होंने कहा ऐसी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति में हर देश की अपनी ऐतिहासिक एवं भौगोलिक स्थिति होती है। सामान विचारधारा के बीच भी स्थिति पूरी तरह सहमत नहीं हो सकती है। उन्होंने भारत के तटस्थ रुख की सराहना भी की।


Thursday, June 30, 2022

ट्रैफिक लाइट और अनियमित गाड़ियाँ व टेम्पो बन रहे जाम का कारण - News Reporting & writing -1

 स्मार्ट सिटी लखनऊ में यूँ तो ट्रैफिक लाइट प्रशासन ने ट्रैफिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए लगायी है ,लेकिन यह ट्रैफिक लाइट अब जाम का एक बड़ा कारण बन रही है ,

स्थिति यह है कि चिनहट की तरफ से पॉलिटेक्निक चौराहे आने पर केवल चंद सेकंड के लिए ट्रैफिक लाइट खोले जाने से भीषड़ जाम लग जाता है, सड़क के किनारों पर बेतरतीब खड़े ऑटो-टेम्पो का कब्ज़ा रहता है ,जिसकी वजह से आवगमन बाधित रहता है।

चिनहट से पॉलिटेक्निक आने वाले वाहनों  आवाजाही अधिक है वहीँ उन्हें कई देर तक रेड लाइट पर इंतज़ार



 करना पड़ता है और बहुत थोड़े समय के लिए ग्रीन सिगनल मिलता है जिसकी  वजह से वाहनों का ताँता लग जाता  है , सोमवार को भी इस रूट पर , घंटे भर का जाम लगा मिला। 

 वहीं मुंशीपुलिया की तरफ से पॉलिटेक्निक आने पर कि ट्रैफिक पुलिस के उपस्थित न होने के कारण वाहन चालक सिग्नल बेफिक्री से तोड़ते दिखे , ई-रिक्शा चौराहे के पहले रुक जाते हैं , और सिटी बस

कहीं भी सवारी उतारती है , जिससे जाम की स्थिति दिखने लगती है। 

 निशातगंज जाने के वाले रास्ते पर ट्रैफिक पुलिस की मौज़ूदगी व  ट्रैफिक लाइट खुलने बंद होने के सही समय के कारण ट्रैफिक सुचारु रूप से चलता मिला।  

व्यापारियों के अतिक्रमण से नागरिक बेहाल - प्रशासन मौन News writing - 2



 

व्यापारियों के अतिक्रमण से नागरिक बेहाल - प्रशासन मौन

 

लखनऊ 30 जून -शहर में स्थित चिनहट बाजार में दुकानों के खुलने के साथ ही सड़क के दोनों तरफ पटरी पर दुकानदारों द्वारा अपने सामान को लगाकर , सड़क को संकरा कर देते हैं ,जिससे ई -रिक्शा ,दो पहिया व चार पहिया वाहन आदि से जबरदस्त जाम लग जाता है ,जाम में घंटो तक आम नागरिक फंसा रहता है जबकि बाजार के निकट थाना चिनहट स्थित है किन्तु इस ओर  पुलिस अपना कर्त्तव्य पालन करने में असमर्थ दिखाई दे रही है।  जिससे नागरिकों में आक्रोश है।



 

मैंने  पड़ताल में पाया कि दुकानदारों का फुटपाथ पर कब्ज़ा रहता है जिसकी वजह से जिसकी वजह से मुख्य चिनहट बाजार मार्ग संकरा हो जाता है। लगभग सभी दुकानदारों ने बाजार की सड़कों पर अपना सामान बाहर रखकर अतिक्रमण किया हुआ  है, इसके बाद भी स्थानीय प्रशासन कोई कार्यवाही नहीं कर रहा है।

 बाजार में लगभग 2000 दुकानें व प्रतिदिन बाजार में १०००० -१२००० लोगों की आवाजाही होती है।

 ई - रिक्शा के कारण  कुछ जगहों पर जाम की स्थिति होती है , ललित वस्त्रालय व कोतवाली चिनहट के चौराहे पर हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है।

 पूरे चिनहट इलाके व बाजार में एक पार्किंग नहीं है जिसकी वजह से दुकानदारों का व्यापार प्रभावित हो रहा है स्थिति यह है कि  लोग अपने वाहन रोड पर ही खड़े कर रहे हैं। इस विषय को लेकर व्यापारियों द्वारा डीएम ,पुलिस व नगर निगम के अधिकारियों  को आवेदन देकर अवगत कराया जा चुका है।

 पूरे इलाके में सिर्फ एक सामुदायिक शौचालय है , जिसकी स्थिति बेहद ख़राब है , इसकी वक़्त साफ़ सफाई न होने के कारण गन्दगी अटी पड़ी है। सर्वाधिक परेशानी महिलाओं को होती है।  शौचलाय डूडा द्वारा संचालित है। 

 पेयजल - चिनहट में सरकारी पेयजल मुहैया कराने  की कोई सुविधा नहीं है , इलाके में दो चापाकल हैं , जो काम नहीं करते।  राहगीर दुकान से पानी की बोतल खरीदकर पीते हैं अथवा दुकानदारों से पानी मांगकर पीते हैं।

 इस सम्बन्ध में भारतीय उद्योग किसान व्यापार मंडल के प्रदेश उपाध्यक्ष व् जिला अध्यक्ष नीरज गुप्ता ने बताया कि मुख्य रूप से चिनहट बाजार में पार्किंग की व्यवस्था प्रशासन द्वारा न होने के कारण जाम की स्थिति पैदा हो जाती है, दिन भर ई -रिक्शो के बेतरतीबी से खड़ा रहने व् चलने से जाम लगा रहता है इस समस्या से निजात पाने के लिए प्रशासन को व्यापार मंडल द्वारा अवगत कराया जा चुका है तथा पटरी दुकानदारों को समुचित जगह व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी प्रशासन की है।  

भाई को ख़त

प्यारे दद्दा , जानते हैं पिछले एक-दो महीने से तुम और हम ज्यादा ही व्यस्त चल रहे हैं और एक तो तुम्हारी नाईट आईटी जॉब

जिससे हम लोगों को बात करने का समय ही ढंग से नहीं मिल पा रहा तुम अक्सर पूछते हो न क्लास कैसी जा रही है ,

आज क्या हुआ और हम कहते हैं कुछ नहीं बस ठीक गया..... 

तुम मेरे विभाग से डॉ मुकुल श्रीवास्तव से तो मिले ही थे जब हम मेरे एडमिशन के सिलसिले में डिपार्टमेंट आये थे। 

मेरी फीस नहीं जमा हो पायी थी तो सर ने कहा था कि  अब कुछ नहीं हो सकता लिस्ट हमारे पास पहले से बनके  आती है ,

हमारे जाते हुए उन्होंने मुझसे पूछा  था कि  मॉस  कम्युनिकेशन ही क्यों तब हम ब्लेंक हो गए थे शायद सही से तब

पता भी नहीं था  और मन में कई सरे डर  भी थे और उन्होंने एक लाइन कही थी लिखना कोई किसी को सिखा नहीं सकता ,लिखना लिखने से आता है , फिर हम लौट आये थे।  आखिर कुछ मशक्कत के बाद मेरा दाखिला लखनऊ विश्वविद्यालय के

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में हो ही गया। 


आज एक महीना होने को है , सर ने हमे इन बीती छुट्टियों में एक असाइनमेंट दिया था जिसमे उनकी क्लास के बारे में अपने अनुभव एक चिट्ठी के रूप पे किसी को लिखना है। मेरे ज़ेहन  में तुम्हारा ख्याल आया वैसे भी व्यस्तता

के कारण  आज कल हम दोनों भाई बात नहीं कर पा रहे। 

हाँ तो सर से हमारी क्लास में  पहली मुलाकात से शुरू करते हैं , पहली क्लास खत्म होने के बाद सर की क्लास आती है ,
उन्होंने कक्षा में दाखिल होने के साथ अपनी बात कहनी शुरू की ,उन्होंने कहा कि  वो हमसे हमारा नाम अभी फ़िलहाल

नहीं पूछेंगे मुझे उस वक़्त थोड़ा अजीब लगा मगर एक राय  न बनाने की कोशिश की। 


सर ने उस पहली क्लास में कहा था कि  तीन तरह के लोग इस कक्षा में आएं हैं पहले जो कुछ करना चाहते हैं जिनकी

कुछ आकांक्षाएं हैं , दूसरे वो लोग जो तफरी मौज मस्ती के लिए आएं हैं , और तीसरे कंफ्यूज इंसान जो तय नहीं कर

पते उन्हें क्या करना है और दद्दा तुम तो जानते हो वो तीसरे टाइप के हम ही हैं , मगर अब मेरे ख्यालों में कुछ

स्पष्टता व् कुछ संशय बचा हुआ है कि  क्या मेरा मॉस  कम्युनिकेशन में दाखिला लेना एक सही फैसला था। 

उन्होंने उस पहली क्लास में उस वाक्य को पूरा किया कि  “लिखना कोई किसी को सिखा नहीं सकता है ,

लिखना लिखने से आता है और बेहतर लिखने के लिए खूब पढ़ना पड़ता है। जैसे तुमको शुरू की क्लास का एक किस्सा बताते हैं उन्होंने कहा फ़र्ज़ करो तुम्हारे पास पैसे और सक्सेस हो औरआप अपने घर में पहली मटेरियलिस्टिक वस्तु  क्या लाएंगे तो  किसी ने जवाब दिया कि  जगुआर कार ,किसी ने डिशवाशर और एक ने बड़ा सा आलिशान घर बाकी क्लास के लोग ऐसी बातें सुनकर हसने लगे मगर खुदतो इतनी झिझक थी हम लोग कुछ कहें और हमारा भी ऐसे मखौल उड़े फिर सर ने कहा हम एक ऐसे देश की बात कर रहे जहाँ की लगभग 30 प्रतिशत आबादी को दो वक़्त की रोटी नहीं नसीब होती , जिस  देश के अधिकतर लोगों के पाबुनियादी सुविधाएँ नहीं है जैसे कि रोटी कपडा और मकान , उस देश में किसी को जैगुआर  कार , किसी को डिश वाशिमशीन चाहिए और फिर क्लास की वो हसी का माहौल एक गंभीरता का रूप ले लिया।


ऐसे ही मुकुल सर कोई टॉपिक पढ़ाते हैं तो उस विषय से बात शुरू होकर हस्ते हँसाते समाज , देश दुनिया के मुद्दों और

उदाहरणों को विषय से जोड़ कर समझते हैं ,जिसमे शायद ही उबा  देने की गुंजाईश बचती है।  

इस क्लास में हमे मीडिया की चमक दमक के इतर इस फील्ड की चुनौतियों और उसकी आज़ादी पर मंडराते खतरे से भी

अवगत कराया है और कैसे कोई आज के दौर में  जब हर कोई टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के सहारे मॉस 

कम्यूनिकेटर बना फिर रहा है उसके सामने , हमारी ज़िम्मेदारी एक मॉस कम्यूनिकेटर के तौर पर अपनी बात

कैसे रखनी है अब आज और बढ़ गयी है , किस तरह हम इस तेज़ी के दौर में अपनी बात ज़िम्मेदारी के साथ

एक प्रभावी तरीके और निष्पक्षता से लोगों तक पंहुचा सकते हैं। 

हमारे शिक्षक मुकुल सर एक शिक्षक की तरह दिशा देने के साथ विद्यार्थी के तौर पर हम क्या नहीं समझ पा रहे हमारकम्युनिकेशन में क्या दिक्कतें हैं  उसे बखूबी समझते हैं क्योंकि एक वक़्त वो भी इसी डिपार्टमेंट की इन्ही कुर्सियों परहमारी तरह बैठा करते थे। 

हमारी इस क्लास में ज्यादा से ज्यादा सवाल पूछने को कहते हैं और उसका पूरी तरह से समाधान करने की कोशिश करते हैं , और तुम भी कहते हो “Its not about the answers its about the better questions” उस समय ये बात नहींसमझ आती थी अब यहाँ आने के समझ आने लगी ज्यादा जलना मत सर की बात समझ आती है भाई की नहीं , तुमको भी अपने बयां करने के अंदाज़ पे काम करने की जरुरत है ( हा हा मजाक कर रहे थे सड़ना मत) . 

सर अक्सर एक लाइन बोलते हैं कि "ठण्ड और बेज्ज़ती जितनी ज्यादा महसूस करो उतनी लगती है “ सर के लफ़्ज़ों में सारा मामला अंदाज़-ए -बयाँ  का होता है कि  कैसे कोई ऑडियंस को कुछ लिखे या कहे की ओरआकर्षित कर सके , उन्हें अपने शब्दों में फसा ले जैसे वो मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर कहते हैं“ हैं और भी सुख़नवर बहुत अच्छे कहते हैं ग़ालिब का अंदाज़-ए -बयाँ और। "


पता है दद्दा सर की क्लास में  अधिकाँश उदाहरण फिल्मो और गानो  के होते हैं

हालाँकि कुछ फिल्मों और गानो के नाम हमने पीछ्ली बार ही सुना होता है , तो उससे खुद को जोड़ कर नहीं देख पाते और

तुम तो जानते ही हो मेरी उर्दू और शेर और शायरी की समझ कितनी काम है खैर इसे भी सुधरने की कोशिश करेंगे। 


अभी फ़िलहाल मुझे कुछ स्पष्टता हुई है किस तरह हम अपनी भाषा , सम्प्रेषण और बाकि तमाम चीज़ों को ठीक कर सकतें हैं और हमे खूब ज्यादा

पढ़ने की जरुरत है जैसा तुम भी अक्सर कहते हो हमसे किताबें ही हमे बहुत कुछ सिखाती हैं और उनकी सीख से दुनिया को समझने का आयाम

मिलता है चलो मगल कहते हैं न देर आये पर दुरुस्त आये।


इस एक महीने के दरमियान पूरे ही विभाग का बहुत अच्छा अनुभव हुआ खासकर हमारे HOD डॉ मुकुल श्रीवास्तव की कक्षा का और लगता है

आने वाले बचे हुए हुए समय में उनसे और बाकि शिक्षकों से बोहोत कुछ सीखने को मिलेगा।


 

तुम्हारा छोटा भाई

                                                            शिवांग





Sunday, June 5, 2022

प्यारे बिस्तर

प्यारे बिस्तर ,

तुम कभी शिकायत नहीं करते  जब मैं  तुम्हे इतना गन्दा रखता हूँ तुम पे कितनी ही किताबों,अखबारों ,पन्नो ,कपड़ो का भार लाद  देता हूँ बेल्ट से लेकर कंघा , चार्जर सब तुम्हारे ऊपर कहीं न कहीं पड़े ही रहते है | 

लगता है घर में सिर्फ मम्मी ही तुम्हारी शुभचिंतक हैं तभी तो हमेशा आके डांटती है तुम्हारे लिए कि  साफ़ करो  , कुत्ता भी कहीं बैठता है तो अपनी जगह साफ़ करके टाइप सरकासम मारती हैं और लाख बार मेरे न सुनने के बाद वो आके तुम्हे झाड़ के नयी चद्दर बिछा के साफ़ कर देती हैं , 
और मैं  वापस से पहले जैसा कर देता हूँ , फिर भी  तुम कभी शिकायत नहीं करते , बल्कि एक आराम का एहसास  और सुकून भरी नींद देते हो | 


पिछले लगभग १५ सालों से तुम मेरे साथ हो , मेरे ख़ुशी के पलों , दुःख की घडी , हर पल संभाला है , शायद ही तुम्हारे अलावा  इतने करीब से , आहिस्ता आहिस्ता मुझे एक शरारती बच्चे से आज बड़े होने  तक का सफर देखा है , चाहे बचपन में की गयी  तकियों की लड़ाई , तुम पर कूदना , अपने ख़याली दुनिया में खोना , ज़िद्द करना , रोना हसना सब और आज बड़े होने पर भी अपने विचारों की समुन्दर में खोना, उलझन ,अवसाद में  तुम्हारे कोने पे लेटे रहना , बड़बड़ाना , राजाओं की तरह टेकानी लगा के लैपटॉप पे फिल्म देखना या कुछ काम करना और मोबाइल की स्क्रीन से  चिपके रहना | 


मगर तुम्हारा ख्याल कभी मेरे दिमाग में आया ही नहीं , आखिर बार तुम पर तब ध्यान दिया गया था जब तुम्हारा एक पावा टूट गया था , और बढ़ई को बुलाना पड़ा था और उसने आके तुम्हे वापस से खड़ा कर दिया था।  

तुम्हे याद है न पहले तुम पर वो रुई वाला एक मोटा गद्दा पड़ा रहता था , और वो तुम्हारे साथ कितने सालों से था  मगर मेरे ज्यादा आराम के कारण  वो गद्दा जो तुम्हारे साथ इतने साल से था अलग कर दिया गया और उसकी जगह लेली स्लीपवेल  की आरामदेह मैट्रेस ने , तुम्हे कैसा लगा होगा उससे अलग होके  ये शायद एक प्रेमी ही समझ सकता है जो अपनी प्रेमिका से अपने घर वालों के कारण  बिछड़ गया |  

जिंदगी भी इसी तरह होती है हम कुछ लोगों की बिना परवाह किये उन्हें फॉर ग्रांटेड ले लेते हैं , और वो हमे आराम पहुंचाने के लिए हर एक  चीज़ करते हैं और एक दिन ख़ुद टूट के बिखर जाते हैं | 

Saturday, June 4, 2022

बुलडोज़र की राजनीति

 मई २०२२ 

हमारी यादें बुलडोज़र के साथ बहुत गहरी है , भारत में बेरोज़गार लोगों के लिए एक मनोरंजन व  वक्त जाया करने का साधन है , कहीं भी JCB  मशीन कुछ बना रही है कुछ गिरा  रही है  इसे देखने ही एक भारी मज़मा लग जाता है 

हम भारतीयों  की आदत ही कुछ ऐसी है ,  यहाँ  २-३ लोग भी कुछ देखने को रुकते हैं तो देखा देखी  में पूरा मोहल्ला पहुंच जाता है  , यहाँ एक चीज़ की बहुतायत  है “समय “ तभी तो लोग अपना कीमती काम छोड़ कर भीड़ में शामिल होते हैं , चाहे कहीं  गड्ढा खुद रहा हो , या कोई दीवार , इमारत  गिरायी जा रही  हो इत्यादि। 

आज कल ये  JCB  मशीन उर्फ़ बुलडोज़र फिर चर्चा का विषय बना हुआ है अब भी इसे देखने के लिए भारी मज़मा लग रहा है मगर उसके आस पास खड़े लोगों की आँखों में आंसू हैं , वो सहमे हैं ,उन्हें समझ नहीं आ रहा उनकी क्या  गलती है जो बरसों  से ईंट -ईंट  जोड़ कर बनाया उनका छोटा सा आशियाना एक दिन ढहा  दिया  जा रहा है |


 कानून तो भारत में खैर अँधा हैं यहाँ का सिस्टम है, जिसकी लाठी उसकी भैंस तो लाठी सरकार के हाथ में है , और फ़िलहाल सरकार बुलडोज़र को लाठी बनाये हुए है, सरकारी तंत्र में बैठे लोगों को इससे परहेज़ नहीं है उल्टा उन्हें तो ये कुछ नारे भा गए हैं जैसे बाबा का बुलडोज़र हो या मामा  का बुलडोज़र।

 कुछ उन्मादी लोगों  को यह कृत्य भा रहा है उन्हें इस सरकार के अवैध अतिक्रमण तोड़ो अभियान में विशेष रूचि है क्योंकि उनके मतलब इससे सध रहे हैं। 

आज कल फिर नया चलन इस देश में चल पड़ा है धार्मिक नारों के सहारे अराजकता फैलाना , लोगों को चिन्हित कर मार पीट का  और पथरबाज़ी का , एक को सरकार  का आश्रय प्राप्त है वहीं दूसरा वर्ग उनकी आँखों में खटकता है कुछ समय पहले  देश में कई जगहों पर हुई राम नवमी और हनुमान जयन्ती पर हिंसा,संपत्ति को नुकसान और दंगों से से शुरू ये बुलडोज़र की राजनीति अपने ज़ोरो पर है 

कायदे से तो ये होना चाहिए था , कि  पुलिस दंगो को नियंत्रित करे , दोषियों को गिरफ्तार करे और कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर उचित दंड दिलाए , यदि किसी ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है , और वह कोर्ट में साबित हो जाता है तो अपराधी से वसूली की उचित प्रक्रिया मौजूद है | शायद भारतीय न्यायपालिका की कार्यवाही लचर है और काफी समय लेती है तभी तो सरकार को ये काम अपने हाथों में लेना पड़ रहा है 

 गलती किसकी है उन लोगों की जो सालों से अतिक्रमण करे बैठे हैं और सरकारी कार्यवाही में पीड़ित नज़र आ रहे  मगर सरकार द्वारा किसी विशेष कारण चिन्हित किये जा रहे या वे जो इस कार्यवाही से खुश हो रहे। 

ये दिशाहीन, उन्मादी  लोग जो सरकार की इस त्वरित कार्यवाही से खुश हो रहे , उन्हें घरों को उजड़ता देख एक सुकून की अनुभूति हो रही, लेकिन जंगल में सूखे पेड़ों से शुरू हुई आग पहले हरे पेड़ों को भी और फिर धीरे धीरे पूरे जंगल को जला कर राख़ कर देती है |


शिंजो आबे की हत्या के बाद सत्तारूढ़ पार्टी की जीत

शिंजो आबे की हत्या के बाद सत्तारूढ़ पार्टी की जीत  हाल के चुनाव के कैंपेन के दौरान एक सभा में पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की गोली मार कर निर...